
(अतिथीस्तंभ)

जम्मू आनंद
(वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ते)
कोरोना माहमारी से पूरी दुनिया परेशान है और भारत उससे अलग नहीं है! यहां तक कि कोरोना संक्रमण का असर दुनिया में अमेरिका के बाद अगर कोई देश में हुआ है तो वह है भारत! इस महामारी का पहला चरण जो फरवरी 2020 शुरू हुआ और लगभग जनवरी 2021 तक कुछ काबू में आया! लेकिन फिर फरवरी 2021 से कोरोना का दूसरा चरण ने आगाज किया और देखते-देखते मुश्किल से 2 महीनों में पुरे देश को अपने गिरप्त में ले लिया! आज पूरा मानवीय समाज क्षुब्द है सहमा है! हर रोज पुरे देश में सैकड़ों के तादाद में लोग मर रहे है! शमशान घाटों में मुर्दों को जलाने एवं दफनाने के लिए क़तर है तो वंही कोरोना महामारी से पीड़ित दवाखानो में भर्ती होने के लिए लाईन लगाए हुए हैं!
लेकिन इन दो चरणों में जो आरोग्य व्यस्था का चेहरा सामने आया वह भी भिन्न भिन्न है! पहला चरण में कोरोना महामारी से मुकाबला करने के लिए सरकारें सार्वजनिक आरोग्य व्यवस्था पर निर्भर थी! इसलिए पहली बार सरकारी दवाखानों में काम करने वाले डॉक्टर, नर्सेज हो यह अस्पताल प्रखरता से अपने उपास्थि को दर्ज कर रहे थे! लोग इन अस्पतालों के बारें में बड़े कृतज्ञ थे! निजी आरोग्य व्यवस्ता तो सहमा हुआ था और अपने दरवाजे पर ताला लगाए हुए था!
कोरोना के पहले दौर ने सार्वजनिक आरोग्य व्यवस्था की सीमाएं एवं उसकी लचर अवस्था को को भी उजागर किया जो की एक सचाई थी! अतः पुरे देशवाशियों ने यह उम्मीद की थी की केंद्र सरकार से लेकर तो राज्य सरकारें अपने अर्थसंकल्पों में सार्वजनिक आरोग्य व्यवस्था को मजबूत करने हेतु बढ़ चढ़कर वित्तीय प्रावधान करेंगे! लेकिन ऐसा नहीं हुआ! ये सबको मालूम था की कोरोना की दूसरी लहार जल्द हम सब को घेरने वाली है!
हुआ ये की पहले चरण में अपने अपने निजी अस्पतालों को ताला लगाने वाले डॉक्टरों ने ये समझ लिया था की कोरोना का दूसरा चरण उनके लिए एक वरदान से कम नहीं होगा. दूसरा चरण आते आते शरीर में एंटीबॉडीज विकसित करने वाली वैक्सीन तैयार हो चुके थे और टीकाकरण की घोषणा के लिए कंपनियों भी तैयार बैठी थी! मतलब निजी व्यवसाय करनेवाले डॉक्टर, निजी अस्पतालें, दवाई कम्पनिया, भ्रष्ट नौकरशाही और असंवेदनशील-अमानवीय राजकीय नेतृत्व का गटजोड़ ने पूरी तैयार कर ली की लाशों पर से मुनाफा कैसे कमाया जाय! और हुआ वही! कोरोना के इस विपदा में राजकीय नेताओं ने अपने आपको चमकाने एवं वे कितने महान है इसे स्थापित करने का एक सुनहरा अवसर के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया!
पहले चरण में अनुभवहीनता के चलते नौकरशाही यह जताने में लगी थी उससे बेहतर कोरोना का कोई और मुकाबला और प्रबधन नहीं कर सकता! समाज में भी एक धरना बन गयी थी की कोरोना से मुकाबला करने का मतलब जैसे सरहद में सैनिक जिस तरह से दुश्मन सैनिकों का मुकाबला करतें है उससे कोई कम नहीं है! हम में से कौन है जो उन दृश्यों को भूल सकते है जब सरकारी चिकिस्तको, आयुक्तों, पुलिस कमिश्नरों आय ए एस/आय पी एस अधिकारीयों पर लोग फूल बरसाते थे! यंहा तक कोरोना ग्रस्त नागरिक अस्पतालों से जब खास कर पुरुष सदस्य घर लौटते तो बाकायदा परिवार वाले उनका घर के दरवाजे पर आरती उतार कर और फूल बरसा कर स्वागत करते थे!
लेकिन दूसरे चरण आते आते नौकरशाही भी कुछ समझदार होने लगी! अभी भी निर्णय तो नौकरशाही ही ले रही है लेकिन उन निर्णयों को जाहिर जनप्रतिनिधियों के माध्यम से करवाया जाने लगा! पहले चरण में जनप्रतिनिधियों ने काफी नाराजगी भी व्यक्त की थी की कोरोना के प्रबधन में उन्हें विशवास में नहीं लिया जा रहा. नौकरशाही जानती है की जनप्रतिनिधि लोकप्रियता के भूके होते है अतः उसने इस बार पत्र परिषद के माध्यम से घोषणा करने की जिम्मेदारी जनप्रतिनिदयों पर डाल दी है!
जनप्रतिनिधि इतना लाचार और निर्दयी हो गया की अब उसको लोग मरे न मरे, इलाज हो या ना हो, सरकारी अस्पतालों की हालत लचर हो या ना हो, दवाइयां हो या नो हो, निजी अस्पताल मनमानी करे या ना करे, दवाईयों की कालाबाज़ारी हो या ना हो, निजी अस्पतालों में मरीजों की लूट हो या ना हो, निजी अस्पतालों में मरीजों को अनावश्यक दवाई और इंजेक्शन दे या ना दे उससे उसे कुछ लेना देना नही है!
पहले चरण में कोरोना पॉजिटिव लोगों को कहा जाता था की वे छाती का एक्सरे करा ले जो की निजी क्षेत्र में भी 300 रूपए में निपट जाता था! लेकिन अब सीटी स्कैन करना अनियवार्य है जिसे करवाने के लिए 2500 से 3000 रूपए लगते हैं! पहले दौर में जो मरीज नाजुक या फिर जरा गंभीर अवस्था में हो तो उन्हें कोविद वार्ड में भर्ती किया जाता था लेकिन दूर चरण में तो पहले दिन से निजी अस्पताल तैयार बैठे हुए थे हर किस्म के कोविड पॉजिटिव को अनिवार्य रूप से भर्ती किया जा रहा है! जिसका परिणाम है की जरूरत मंदो के लिए अस्पतालों में जगह उपलब्ध नहीं है!
पहले ये बताया जाता था की कौन सा व्यक्ति पॉजिटिव आने के बाद उसकी प्रकृति सौम्य है, साधारण है या तीव्र है इस प्रकार वर्गीकरण किया जाता था लेकिन अब तो एक ही श्रेणी बन गयी पॉजिटिव आया की भर्ती करो! क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की है की पहले चरण में जब पॉजिटिव लोग सरकारी दवाखानो में भर्ती थे तो कितने लोगों को रेमडेसिवोर का इंजेक्शन लगाया जाता था! और अब ऐसा क्या हो गया की रेमडेसिवोर के इंजेक्शन का इतना इस्तेमाल हो रहा है, यंहा तक की उसकी कालबाजारी हो रही है मुश्किल से 1200 रूपए का इंजेक्शन 25 हजार में लोग खरीदने को विवश हो गए है! कोई नेता इस कालाबाजारी पर कुछ नहीं बोलना चाहता!
ऐसी क्या मजबूरी है नेताओं की उन डॉक्टरों के खिलाफ कारवाही करने के बात नहीं करते! क्या इसलिए की वे चुनावों में लाखों का चंदा देते है! और तो और इन डॉक्टरों की मदद के लिए कंपनियों से बात कर हजारों इंजेक्शन उपलब्ध कराये जाने की डींगे मारे जा रहे है! होना तो ये चाहिए था की इस पुरे मामले की जांच होनी चाहिए! कितने निजी अस्पतालों ने कितने मरीजों को रेमडेसिवोर का इंजेक्शन दिया! यह भी पता चलाया जाना चाहिए की उसमे भी कितने लोग मरे! जनता के प्रतिनिधि होने का क्या मायने है! क्या विवश जनता के साथ खड़े होना या फिर जनता की लूट और शोषण की यंत्रणा के हिस्सेदार बन जाना?
क्या शहर के राजनेता यह भूमिका लेंगे कि जिन निजी अस्पतालों ने बेवजह लोगों को रेमडेसिवोर इंजेक्शन लगाए उनके खिलाफ फौजदारी गुनाह दर्ज कराएंगे? और उनके परिवारजनों को इंजेक्शन के बदले जो पैसा वसूला गया है उसे वापस दिलाएंगे? ऐसा इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि निजी अस्पतालों के मायाजाल के खुद भागीदार है!
यहां तक कि नौकरशाही जो आम आदमी को डंडे मार कर अपने कर्तव्यदक्ष होने का प्रमाण देती है क्या वह इन निजी अस्पतालों एवं डॉक्टरों जिन्होंने नागरिकों के साथ धोखाधड़ी की है उनके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करेंगे? उत्तर है नहीं क्योंकि, राजनेताओं से लेकर नौकरशाह तक सभी निजी अस्पतालों के गिरफ्त में है!
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