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“लॉक डाउन” घरों को कोरोना प्रजनन केंद्र बनाने का उपाय!

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(अतिथीस्तंभ)

जम्मू आनंद

(सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता)

नागपुर शहर में एक बार फिर करोना का प्रताप बढ़ रहा है! जैसे-जैसे यह प्रताप बढ़ता है वैसे-वैसे शहर में कुछ व्यक्तियों की चर्चा भी होने लगती है, जैसे कि पूर्व निगम आयुक्त मुंडे को लाओ, नितिन गडकरी कमान संभालो शहर को बचाओ! और इसी बीच स्थानीय प्रशासन खासकर निगम एवं पुलिस प्रशासन की बैठके तेज हो जाती है और पालक मंत्री के माध्यम से करोना के प्रताप को रोकने हेतु एक मात्र इलाज के रूप में “लॉकडाउन” की घोषणा हो जाती है! “लॉकडाउन” के भी प्रकार है कड़क और शीतल! नागरिक समाज का एक घटक भी बढ़ते हुए प्रकोप के लिए आम आदमी को कोसने लगता है!

अब सवाल यह है कि क्या करें! कौन से वह कदम उठाए जाए जो कि सार्थक हो! क्या लॉक डाउन ही एकमात्र विकल्प है? क्या डंडों की मदद से करुणा के संक्रमण को रोका जा सकता है? अगर ऐसा है तो डंडा का खामियाजा उन्हें भुगतना है जो संक्रमण को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है या फिर वह लोग जो संक्रमण के शिकार है! वास्तविकता यही है कि डंडे उन्हें ही खाने पड़ रहे हैं जो करुणा संक्रमण के लिए जिम्मेदार नहीं है!

पहले तो यह समझने की जरूरत है कि जिस बीमारी का इलाज की कोई दवाई नहीं है उसका संक्रमण को कैसे रोका जा सकता है! स्वभाविक है कि संक्रमित व्यक्ति को अन्य लोगों से दूर रखा जाए या दूसरे शब्दों में जो संक्रमित नहीं है वह संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में ना आए! इसका मतलब आपस में दूरी बने रहे! दूरी बनाए रखने के लिए जगह की आवश्यकता होती है, तो फिर यह जगह कहां से लाई जाए या फिर ज्यादा से ज्यादा खुली जगह कैसे उपलब्ध कराई जाए! कहा जा रहा है कि रोग प्रतिकार शक्ति को बनाए रखना एकमात्र कारगर उपाय है! रोग प्रतिकारक शक्ति पौष्टिक खानपान एवं साईकिल / पैदल चलने से बनी रहती है और बढ़ती भी है! एक व्यक्ति संक्रमित एकाएक नहीं होता है, जब तक कि कोई संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में कुछ समय तक आ ना जाय! दूसरे शब्दों में ऐसा समूह जो काफी समय तक ठहराव की स्थिति में होता है वहां संक्रमण आसानी से हो जाता है और जो समूह चलता फिरता हो वहां संक्रमण होने का अवसर बहुत कम होता है!

अतः कोरोना संक्रमण को रोकने हेतु जगह, रोग प्रतिकारक शक्ति, समूह की अवस्था आदि बातों का ध्यान रखना जरूरी है! नियोजन करते समय इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए! लेकिन व्यवहार में ठीक इसके उल्टा होते हुए नजर आता है! पिछले छह महीनों के कोरोना संक्रमण से प्रशासन, राजनेता कुछ नई समज कल्पता के आधार पर नई तरीके वर्तमान परिस्थिति का मुकाबला करने हेतु कदम उठाएंगे ऐसी अपेक्षा थी! लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता हुआ नजर आ रहा है! वही एकमात्र विकल्प “लॉकडाउन”! शायद “लॉकडाउन” शब्द से हम सबको विशेषकर प्रशासन के लिए इतना मोहित करने वाला शब्द बन गया कि वह उसके परे ना कुछ सोचना चाहता है और ना ही कुछ समझना चाहता है!

जनवरी के आखिरी सप्ताह से इंग्लैंड एवं दिल्ली से बड़े पैमाने पर लोग शहर में लौटने लगे! ना ही नागपुर हवाई अड्डे पर विदेश से आए यात्रियों की RT – PCR टेस्ट कराई गई और ना ही उन्हें विलगीकरण के लिए बाध्य किया गया! उसी प्रकार दिल्ली से आने वाले यात्रियों की टेस्टिंग रेलवे स्टेशन पर नहीं कि गयी! इंग्लैंड में कोरोना का दूसरा चरण चरम सीमा पर था और दिल्ली में नई पॉजिटिव केसस बढ़ने लगे थे!स्थानीय स्तर पर शादियों का माहौल शुरु हो गया शादी की खुली छूट दी गयी! होना तो यह चाहिए था कि शादी में भोजन व्यवस्था पर बंदी लगानी चाहिए थी!

ऐसा इसलिए भी शादी का हॉल हो या लॉन उसका एक चौथाई हिस्सा भोजन व्यवस्था के लिए होता है जहां काफी भीड़ हो जाती है! और वंहा काफी समय तक लोग एक साथ रहते हैं और वहीं पर बड़े पैमाने पर संक्रमण की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता! शादियों में भोजन व्यवस्था पर पाबंदी होती तो भीड़ भी कम होती और मेहमान भी ज्यादा समय तक रुके नहीं होते! यहां पर प्रशासन की कल्पकता का ना होना एक बड़ा कारण रहा है! ज्ञात रहे कि इस बार अपार्टमेंट एवं बंगलों में रहने वाले ज्यादा प्रभावित हुए हैं!

प्रशासन की उदासीनता और असफलता तथा दूसरी और प्रसार माध्यमों की नकारात्मकता ने बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण के लिये बड़े आसानी से सड़कों पर की भीड़ को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया! रोज प्रसार माध्यमों ने भीड़ की एक फोटो खासकर बाजार की छाप कर एक प्रकार से स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया! प्रशासन अपनी विफलता को छिपाने के लिए अवसर ढूंढ ही रही थी और आम आदमी को जिम्मेदार ठहराने के लिए हर वक्त ललायित रहती है उसे आसान मौका मिल गया! और फिर क्या था प्रशासन के पास कोरोना के प्रादुर्भाव को रोकने का एकमात्र रामबाण उपाय “लॉकडाउन” जाहिर कर दिया गया!

क्या किसी ने यह समझने की कोशिश की कि कितने दुकानदार, फुटपाथ दुकानदार, ऑटो वाले, रिक्शा वाले, बांधकाम कामगार, साप्ताहिक बाजार के विक्रेता, गैरेज में काम करने वाले, शारीरिक श्रम करने वाले कोरोना के शिकार हुए हैं! जिन अखबार वालों ने सड़क पर की भीड़ के नाम पर फोटो छापते हैं क्या किसी ने पता लगाने की कोशिश की कि उस भीड़ में कितने लोग संक्रमित हुए हैं! अगर उस भीड़ में लोग संक्रमित हुए होते तो आज शहर का हर घर कोरोना कि चपेट में होता! लेकिन ऐसा नहीं हुआ! “लॉकडाउन” का खामियाजा तो इसी वर्ग को भुगतना पड़ रहा है! जो लोग रोज धंधा कर, हात मजदूरी कर अपने घरों का चूल्हा जलाते हैं उनके परिवारों का क्या हो रहा होगा! क्या राजनेताओं ने, मंत्रियों ने प्रशासकीय अधिकारियों ने इसके बारे में सोचा है! आखिर इन सबको इन सवालों का जवाब देना होगा!

दिनांक 25 जनवरी 2021 को 128 लोग पॉजिटिव थे सवाल यह उठता है कि अगर पॉजिटिव पेशेंट में इतनी गिरावट आई तो फिर अचानक संख्या क्यों बढ़ गई? इसके दो कारण हैं पहला जब पॉजिटिव होने की संख्या इतनी कम हो गई और मात्र 128 और 2000 एक्टिव पेशेंट तो तब एक विशेष रणनीति की आवश्यकता थी! स्थानीय प्रशासन, शासकीय मेडिकल कॉलेज, इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, एम्स नागपुर, सूक्ष्म जीव तज्ञ, उप संचालक सर्वजनिक आरोग्य सेवा महाराष्ट्र राज्य, स्थानीय प्रशासन सब मिलकर कोई रणनीति तैयार करनी चाहिए थी! लेकिन प्रशासन इसे अवसर के रूप में देखने में पूरी तरह से असफल रहा और ना ही राजनेताओं का ध्यान इस पर गया! इसके लिए क्या आम आदमी जिम्मेदार है?

प्रशासन इस बात का भी आकलन नहीं करना चाहता है कि “लॉकडाउन” के बावजूद फिर संक्रमण होने वालों की संख्या क्यों बढ़ रही है! नागपुर शहर में लॉकडाउन दिनांक 25 फरवरी से लागू की गई जिसके मुताबिक सभागृह, मंगल कार्यालय, लॉन, साप्ताहिक बाजार, स्कूल, महाविद्यालय, कोचिंग क्लासेस, प्रशिक्षण संस्थान, राजकीय, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभाएं एवं कार्यक्रमों पर दिनांक 7 मार्च तक पाबंदी लगाई गयी! शनिवार और रविवार को अति आवश्यक सेवाओं के अलावा सब बंद कर दिए गए, लोगों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी गई जो फिर आगे बढ़ाकर 15 मार्च तक कर दी गई और उसके बाद 21 मार्च तक कड़क लॉकडाउन और तो और दिनांक 17 मार्च से और अधिक कड़क लॉकडाउन कर दिया गया!

अब हम देखते हैं कि इस दरमियान जब अधिकांश लोगों को सार्वजनिक स्थलों से हटा दिया गया हो तो कोरोना का क्या हाल रहा! दिनांक 25 जनवरी 2021 को मात्र 128 लोग पॉजिटिव पाए गए थे उसके बाद 17 फरवरी तक यह आंकड़ा 500 के अंदर था ! 24 फरवरी से पॉजिटिव पेशेंट का आंकड़ा एक हजार पार करने लगा! दिनांक 6 – 7 मार्च (शनिवार/रविवार) को पूरा “लॉकडाउन” था! लोगों को घरों से बाहर निकलने पर पाबंदी थी! आइए, देखते हैं दिनांक 7 से 12 मार्च (रविवार से शुक्रवार) के बीच कितने पॉजिटिव कैसेस सामने आये!

1. 07 मार्च- 1271 केसेस
2. 08 मार्च- 1276 केसेस
3. 09 मार्च- 1338 केसेस
4. 10 मार्च- 1710 केसेस
5. 11 मार्च- 1979 केसेस
6. 12 मार्च- 1957 केसेस
कुल= 9531 केसेस

फिर 15 से 21 मार्च तक कड़क “लॉकडाउन” की घोषणा की गई! और तो और 17 मार्च से “अधिक कड़क लॉकडाउन” लागू किया गया! आइए, अब देखते हैं इसका क्या परिणाम हुआ मतलब दिनांक 13 मार्च से शुक्रवार 19 मार्च तक कितने पॉजिटिव कैसेस सामने आये!

1. 13 मार्च- 2261 केसेस
2. 14 मार्च- 2252 केसेस
3. 15 मार्च- 2297 केसेस
4. 16 मार्च- 2587 केसेस
5. 17 मार्च- 3570 केसेस
6. 18 मार्च- 3796 केसेस
7. 19 मार्च- 3235 केसेस
कुल= 19,804 केसेस

13 से 19 मार्च यानी कि 7 दिनों में कुल 19,804 लोग पॉजिटिव हुए! लॉकडाउन के 13 दिनों में कुल 29,335 नए पॉजिटिव कैसेस आए हैं! पॉजिटिव केसेस के आंकड़ों से यह स्पष्ट दिखता है कि “लॉकडाउन” (लोगों को घर पर रखने की) रणनीति उल्टी पड़ी! 80% परिवार जो मुश्किल से 400 फुट के घरों में रहती है जहां कम से कम 4 परिवार के सदस्य होते हैं एक शौचालय होता है तो किसी ने सोचा कि उन घरों में शारीरिक दूरी कैसे बनाई जा सकती है! जबकि घरों के बाहर कि जो खुली जगह है सड़के हैं उसे खोलने चाहिए जिससे लोग आसानी से शारीरिक दूरी बना सके! लोग चहल पहल करते रहे तो संक्रमण की संभावना भी कम होती है! दूसरे शब्दों में शहर की सड़कें, मैदान, चौराहे, बाजार, बगीचे यह कोई शमशान घाट थोड़े हैं जिसे वीराना रखा जाय! शारीरिक दूरी बनाने में इन सार्वजनिक स्थलों का बेहतर उपयोग होना चाहिए ना कि उन्हें अनुपयोगी रहने दिया जाए!

कहा यह जा रहा है कि लॉकडाउन से संक्रमण होने की प्रक्रिया को शिथिल किया जा सकता है क्योंकि इससे संक्रमित होने की श्रृंखला को तोड़ा जाता है !लॉकडाउन तो वह प्रक्रिया है जिसमें संक्रमण होने के लिए पोषक वातावरण बनाना, लोगों को घरों में बंद कर एक प्रकार से करोना के लिए प्रजनन केंद्र बनाया जा रहा है!

धन्यवाद!

(म) 9923022545

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