फक्त..बातमीशी बांधिलकी

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Homeनागपूर न्यूजमहिलाओ के प्रति समर्पित तीन दिवसीय फिल्म फेस्टिवल संपन्न

महिलाओ के प्रति समर्पित तीन दिवसीय फिल्म फेस्टिवल संपन्न

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रूबी सोशल वेलफेयर सोसाइटीद्वारा किया था आयोजित

दिनांक १६ दिसंबर २०२१: हाल ही में तीन दिवसीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया । रुबी सोशल वेलफेबयर सोसायटीद्वारा इस महोत्सव का आयोजन किया गया था । महोत्सव के उद् घाटन सत्र में अपने प्रास्ताविक में संस्था की अध्यक्षा रूबिना पटेल ने फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य क्या है बताकर, किशोरवयीन लडकियों को इसका लाभ लेने का आवाहन किया।

उद् घाटन प्रमोद कालबांडे (उपसंपादक, सकाळ न्युज पेपर) तथा नजमा पटेल इनके हस्ते कागज के फटाके को फोड कर किया गया। उन्होंने संस्था की गतिविधियों की तारीफ करते हुए लड़कियों को फिल्म देखकर सीखने तथा संस्था से जुड़ने को कहा । प्रमुख अतिथि के रुप में समाज सेवक खुशाल ढोक, सर्व श्री हाई स्कूल एंड जूनियर कॉलेज के शिक्षका प्रीति के. भूजाडे, पूनम एल, हिरत्कर उपस्थित थे।

फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन तीन फिल्में ‘अपना हक’, ’तोड़ो बंदीशे’, ‘नेम प्लेट’ दिखाई गई l पहली फिल्म ‘अपना हक’ द्वारा यह दिखाया गया, कि जिन घरों या बस्तियों में पब्लिक टॉयलेट का उपयोग करते हैं, वहां की लड़कियों और महिलाओं को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है l ऐसे टॉयलेट में काफी गंदगी होती है, जिससे बहुत सी बीमारियां होती है और महिलाओं व लड़कियों को घर से बाहर व दुर टॉयलेट जाने में शर्म महसूस होती है, लेकिन कोई चारा ना होने के कारण उन्हें पब्लिक टॉयलेट में जाना पडता है l रास्ते में उन्हें विभिन्न प्रकार से छेड़ा जाता है । इस फिल्म से यह संदेश मिलता है कि हर घर में टॉयलेट होना आवश्यक है और सुरक्षित स्वास्थ्य हर महिला व लड़कियों का संवैधानिक अधिकार है । इन्हीं सब मुद्दों को लेकर ‘राईट टू पी’ कैंपेन शौचालय आंदोलन मुंबई जैसे कई शहरों मे चलाया गया । इस फिल्म में लड़कियों के साथ माहवारी के समय जो परेशानियां होती है, उस पर भी चर्चा की गई । स्कूल और रास्ते में किस प्रकार उन्हें अलग अलग नाम से छेड़ा जाता है, यह दिखाया गया ।

दूसरी फिल्म ‘तोड़ो बंदीशे’ इस फिल्म द्वारा लड़कियों को यह संदेश दिया गया, जल्द व जबरन शादी के कारण कौन से परिणाम होते हैं । उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है वह अपने मन से ना चाहते हुए भी शादी के लिए तैयार होती है। छोटी उम्र होने के कारण उन्हें बहुत सी बातों का ज्ञान नहीं होता, अगर लड़कियां उसका विरोध भी करे तो कुछ समय के लिए वह इस शादी को टाल सकती है । लड़कियों ने अपनी इच्छा और अपनी भावनाओं को अपने माता-पिता के सामने रखना चाहिए, ताकि वह उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे । लड़कियों ने अपनी इच्छा व मर्जी को प्राथमिकता देना चाहिए ।इन्हें अच्छी शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए और एक समझ बन जाने के बाद ही अपने जीवन का कुछ निर्णय लेना चाहिए । उन्हें अपने अधिकारों का पता होना चाहिए, ताकि वह अपने निर्णय लोगों के सामने रख सके। प्रगति के पथ पर जेंडर असमानता को कोई स्थान नहीं है । लड़की होने से हमें शिक्षा लेने से कोई नहीं रोक सकता ।यह हर लड़की का अधिकार है । बल्कि लड़कियों को तकनीकी शिक्षा लेने से रोका जाता है, खेलने से रोका जाता है, बाहर जाने पर पाबंदी होती है, जिससे समाज में क्या हो रहा है उसका पता भी नहीं चलता, शिक्षा प्राप्त करके ही लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के समान आगे बढ़ सकती है। लड़की के मन में आजाद जिंदगी जीने की उमंग होती है, लेकिन उसे अपनी जिंदगी चार दीवारों के भीतर ही गुजारनी पड़ती है, जिससे वह बाहर जाकर अपनी रंग बिरंगी सोच को दूसरों के सामने रखना चाहती हैं। उसका हक है तथा वह आत्मनिर्भर बनकर एक चमकते सितारे की तरह आसमान में चमकना चाहती है। उसके कुछ प्रश्न है क्या हमें जुल्म सहना चाहिए ? क्या हमें मर्दों की हर आज्ञा का पालन करना चाहिए?

तीसरी फिल्म ‘नेम प्लेट’ थी जिसमें बताया गया, कि महिलाएं अपनी मर्जी से मकान नहीं खरीद सकती बिना पति के मर्जी के, अगर खरीद भी ली तो उसकी नेम प्लेट पर पुरुष का ही नाम होता है। अगर कोई महिला अपने पति के नाम के आगे घर की नेम प्लेट पर अपना नाम डालती है तो वह नाम छोटा होना चाहिए। अगर कितनी भी पढ़ी लिखी और विद्वान लड़की क्यों ना हो उसकी उम्र पति की उम्र से बड़ी हो तो उसे ताना दिया जाता है | बड़ी उम्र की लड़की में चाहे उसके पास कितनी भी खूबी हो सिर्फ लोग क्या कहेंगे, यह सोच के कारण शादी के लिए ऐसे लड़की को चुना जाता है जिसकी उम्र लड़के से कम हो | कोई भी पुरुष नही चाहता की वह आर्थिक तौर पर स्त्री पर डिपेंड हो या घर की कमांड एक महिला के हाथ में हो या वह उसका निर्णय माने ।घर की सभी जिम्मेदारीया में महिलाओं को आगे बढ़ाया नहीं जाता । किसी भी निर्णय में महिलाओं की राय नहीं पूछी जाती । अगर पति घर के किसी काम में पत्नी की सहायता करे तो भी उसे अच्छा नहीं माना जाता । बहु या बेटी अगर तरक्की करे तो एक पुरुष प्रधान पति, ससुर, पिता, को उतनी खुशी नही होती जितनी खुशी बेटे के तरक्की करने पर होती है । इसका अर्थ यह है कि, यह हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता है | बेटे से गलती होने पर उसे जल्द माफ किया जाता है और उसका आत्मविश्वास बढ़ाया जाता है जबकि लड़की के साथ इसके विपरीत होता है ,अगर लड़की बाहर जाकर काम करे तो कुछ गलत ना हो जाए इस बात का अंदेशा माता पिता को हमेशा रहता है, सभी माता-पिता चाहते हुए भी अपनी बेटियों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं कर पाते, इन्हीं सब बातों को लेकर यह फिल्म में दिखाया गया है ।

दुसरे दिन ‘कस्तुरी‘, ‘बोल’,‘ छेडखानी’, ‘मर्दानगी’,‘ भेदभाव’, ’गाईड’ यह फिल्मे दिखाई गई।

‘कस्तुरी’ फिल्म दहेज प्रथा पर आधारीत थी। इसमें दिखाया गया कि एक पढ़ी लिखी लड़की होने के बावजुद उसके माता – पिता को दहेज में एक बड़ी रकम देनी पड़ती है । उसका पति एक पुलिस अफसर होने के बावजुद कानुन का उलंघन करता है । दहेज ना देने के कारण उसे मानसिक और शारीरीक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है, और उसकी हत्या कर दी जाती है । समाज में दहेज के कारण बहुत सी लड़कीयॉ आत्महत्या कर लेती है । दहेज एक सामाजिक हिंसा है । इस फिल्म को देखकर सभी लड़कीयों ने प्रतिज्ञा (ओथ ) की वह अपनी शादि में अपने माता – पिता को मनांयेगी की वह किसी प्रकार का दहेज ना दें और अपने बेटों की शादी में ना लें । उसी तरह से वह दहेज लेने व देने के बारे में अपने आस – पास के पड़ोसियों व रिश्‍तेदारों को दहेज के बारे में जागरूक करेंगी।

‘बोल’ इस फिल्म में बताया गया की, परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजुद लड़के की चाहत में एक पिता लगातार १४ लड़कियों का जन्म देता है । उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता है, घर की ४ दिवारी व पर्दे में रखा जाता है । जब बेटा पैदा होता है और पता चलता है कि, वो ना लड़का है ना लड़की, वह किन्नर है, तो वही पिता जो बेटे की चाहत में पागल था उस बेटे को जान से मार देता है। धार्मिकता का सख्ती से पालन करने वाला एक व्यक्ति बेटा पैदा करने के लिए किस प्रकार हालात का शिकार होकर सेक्स वर्कर महिला से शादी करके आखिर में लड़की ही पैदा करता है । इसमें एक बेटी द्वारा उसके पिता की हत्या करते हुए दिखाया गया है । जिसके लिए उसे फांसी दि जाती है ।वह अपनी आखरी इच्छा में सभी पत्रकारों के सामने कहती की मै कातील जरूर हु लेकिन गुनहगार नही। साथ ही वह अपने बहनो को यह संदेश देती है अपनी अपनी बंदीशो को तोड़कर अपनी जिंदगी जीये, शिक्षा प्राप्त करे और तरक्की करे।

“छेड़खानी’ ‘फिल्म:-भारत देश की स्थिती आज यह है की महिलाओ तथा किशोरीयो पर यौन हिंसा जैसे बलात्कार , छेडखानी का प्रमाण दिन पर दिन बढता जा रहा है । अगर लड़कियों या महिलाओं के साथ किसी किस्म की छेड़खानी होती है तो उस परीवार के सभी पुरूष सदस्यों के सामने बताना चाहिए, ताकि उनमे मौजुद पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव आए और वह दुसरे लड़कियो व महिलाओ को ना छेड़े, बलात्कार के लिए छोटे कपडे़ जिम्मेदार नहीं है । सोच व मानसिकता में बदलाव होना चाहिए । अगर किसी महिला व लड़की के साथ छेड़खानी होती है तो उसे अपने स्थान के‘ हेल्प लाईन नं’ पर फोन करके पुलिस या कानुन की सहायता लेनी चाहिए । मिशन हजार अर्थात अगर किसी घर में हिंसा हो रही है तो डोर बेल बजाकर उसे रोका जाता था । इसमें यह भी दिखाया गया कि एक अच्छी सोच वाला ऑटो ड्रायव्हर पुरूष रात के समय किसी अंजान लड़की या महिला की सहायता कर सकता है ।यह फिल्म देखकर लड़कियो ने इस तरह नारे लगाये (Stop Sexual Harassment) यौन उत्पीड़न बंद करो, (Stop Violence) हिंसा बंद करो, लड़कियो को छेड़ना बंद करो । पुलिस, रेलवे जैसे अलग – अलग विभागों में ज्यादा से ज्यादा लड़कीयो व महिलाओ को आना चाहिए ताकि वह अपने आप को सुरक्षित महेसुस करे ।

‘मर्दांनगी’ फिल्म दिखाने के बाद लड़कियो से पुछा गया की मर्द या जीवन साथी कैसा होना चाहिए ? कुछ लड़कियों ने कहा कि, बॉडी बिल्डर होना चाहिए, खुबसुरत, ऊंचा, बडी़ बड़ी मुंछे हो और हीरो जैसा होना चाहिए, कुछ लड़कियो ने कहा कि परवाह करने वाला, उसका ख्याल रखने वाला, जिम्मेदार हो, अपनी गलती को माने और अपनी भावनाओ को ना छुपाए, वह भी हंसे रोये, सभी लड़कियो ने बताए की उनका जीवन साथी ऐसा होना चाहिए । कमला भसीन के विचारो पर भी चर्चा की गई । पितृसत्तात्मक सोच के कारण मर्द को बेहतर समझा जाता है, औरत को कमतर व कमजोर समझा जाता है । औरत ने पती की सभी बाते माननी चाहिए और घर के सभी काम, जिम्मेदारी बखुबी निभानी चाहिए व मर्द की आज्ञा का पालन करना चाहिए, उसकी बात ना सुनने और गलती होने पर जब उसे मारा या पीटा जाए तो उसका विरोध ना करे। हमारी रिवाजों, प्रथा,पंरपराओं द्वारा भी पितृसत्ता को बढ़ावा दिया जाता है जैसे राखी मे भाई छोटा होने पर भी वह अपनी बड़ी बहन की रक्षा करेगा । करवाचौथ, मे पति की लंबी उम्र व उसकी रक्षा के लिए पत्नी व्रत रखे ।

पति यानी स्वामी और पत्नी दासी, यह पितृसत्तात्मक सोच है । रोना मर्दानगी के खिलाफ है, पुरूष अपनी कमजोरी को बयान नही कर सकता । पितृसत्ता ने मर्दो की मानवीयता को छीन रखा है, औरत अपने आप को कमजोर समझती है। अक्सर मध्यम वर्ग की औरतें उन पर हो रही हिंसा को छुपाती है । हम भी यहां समझते हैं कि औरतों की सोच बदल रही है । वह पितृसत्ता को समझते हुए उन पर हो रहे जेंडर भेदभाव को समझ रही है। अब लड़को व मर्दो की सोच बदलनी है। हमें मातृसत्ता नहीं चाहिए, हमें‘ समानता’ चाहिए ।कमला भसीन ने यह भी कहा है कि, पति देव को घर से बाहर भेजा जाए और जीवन साथी को अंदर लाया जाये । जब उनके बच्चे अपने घरो में यह प्यार वाला माहौल देखेंगे तो उनमे अच्छी सोच निमार्ण होगी ।

‘मनुस्मृति’ में औरत को कभी स्वतंत्र नहीं बताया गया। बचपन में पिता, जवानी में भाई, शादी के बाद पति और बुढा़पे मे उसका बेटा रक्षा करता है, स्त्री मरते दम तक कभी स्वतंत्र नही है । धार्मीक तौर पर भी समाज मे औरतो को दुसरा दर्जा दिया जाता है । डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर ने इसका विरोध करते हुए मनुस्मृति के विचारो का दहन किया है इसीलिए हम महिला आंदोलन, स्त्री मुक्ती दिवस २५ डिसेंबर से १० जनवरी तक मनाते है ।

‘भेदभाव’ यह फिल्म जाती भेदभाव पर आधारीत है निचले जाती के लोगो को शिक्षा से वंचित रखा जाता है क्योकी उनमे जागृकता आएगी तो वह समाज के जातिवाद का विरोध करेगे और समानता के लिए लढेंगे।

‘गाईड’ इस फिल्म मे दिखाया गया की जब एक महिला पर यौन हिंसा होती है तो उसके मन मे पुरी पुरूष जाती के प्रति नफरत पैदा होती है और वह सभी को अपना दुश्मन मानती है । जब की सभी पुरूष एक समान नही होते है। स्त्री व पुरूष दोनो जिंदगी की गाडी के पहियो के समान है और दोनो को समान अधिकार है ।

जेंडर के आधार पर काम को भी स्त्री पुरूष में बांटा गया है । घरेलु काम, सिस्टर, टिचर, स्टैनो, आदि महिलाओं की पहचान मानी जाती है । बाहर के सभी काम जिसमे ज्यादा मेहनत ना हो और तनख्वाह ज्यादा हो वह पुरूषो को दिये जाते है । एक ही जैसे काम के लिए पद व तनख्वाह में अंतर होता है । यह सभी बातों पर चर्चा की गई ।

इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए RSWS टीम अध्यक्ष रूबीना पटेल, शहनाज खान, जयंत चिमंत्रवार, शिरिन कौसर, आफरीन खान, पुजा सहारे, माया जाधव, कैासर आजमी, फरीदा शेख, तथा मुस्लिम महिला मंच के सदस्य समीना शेख जिनत शेख , दानिश नजमा बेगम अपना योगदान दिया ।

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